line image विक्रम और शनि
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शनि से संबंधित विक्रमादित्य की कहानी को अक्सर कर्नाटक राज्य के यक्षगान में प्रस्तुत किया जाता है. कहानी के अनुसार, विक्रम नवरात्रि का पर्व बड़े धूम-धाम से मना रहे थे और प्रतिदिन एक ग्रह पर वाद-विवाद चल रहा था. अंतिम दिन की बहस शनि के बारे में थी. ब्राह्मण ने शनि की शक्तियों सहित उनकी महानता और पृथ्वी पर धर्म को बनाए रखने में उनकी भूमिका की व्याख्या की. समारोह में ब्राह्मण ने ये भी कहा कि विक्रम की जन्म कुंडली के अनुसार उनके बारहवें घर में शनि का प्रवेश है, जिसे सबसे खराब माना जाता है. लेकिन विक्रम संतुष्ट नहीं थे; उन्होंने शनि को महज लोककंटक के रूप में देखा, जिन्होंने उनके पिता (सूर्य), गुरु (बृहस्पति) को कष्ट दिया था. इसलिए विक्रम ने कहा कि वे शनि को पूजा के योग्य मानने के लिए तैयार नहीं हैं|


विक्रम को अपनी शक्तियों पर, विशेष रूप से अपने देवी मां का कृपा पात्र होने पर बहुत गर्व था. जब उन्होंने नवरात्रि समारोह की सभा के सामने शनि की पूजा को अस्वीकृत कर दिया, तो शनि भगवान क्रोधिक हो गए. उन्होंने विक्रम को चुनौती दी कि वे विक्रम को अपनी पूजा करने के लिए बाध्य कर देंगे. जैसे ही शनि आकाश में अंतर्धान हो गए, विक्रम ने कहा कि यह उनकी खुशकिस्मती है और किसी भी चुनौती का सामना करने के लिए उनके पास सबका आशीर्वाद है. विक्रम ने निष्कर्ष निकाला कि संभवतः ब्राह्मण ने उनकी कुंडली के बारे में जो बताया था वह सच हो; लेकिन वे शनि की महानता को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थे. विक्रम ने निश्चयपूर्वक कहा कि "जो कुछ होना है, वह होकर रहेगा और जो कुछ नहीं होना है, वह नहीं होगा" और उन्होंने कहा कि वे शनि की चुनौती को स्वीकार करते हैं.


एक दिन एक घोड़े बेचने वाला उनके महल में आया और कहा कि विक्रम के राज्य में उसका घोड़ा खरीदने वाला कोई नहीं है. घोड़े में अद्भुत विशेषताएं थीं - जो एक छलांग में आसमान पर, तो दूसरे में धरती पर पहुंचता था. इस प्रकार कोई भी धरती पर उड़ या सवारी कर सकता है. विक्रम को उस पर विश्वास नहीं हुआ, इसीलिए उन्होंने कहा कि घोड़े की क़ीमत चुकाने से पहले वे सवारी करके देखेंगे. विक्रेता इसके लिए मान गया और विक्रम घोड़े पर बैठे और घोड़े को दौडाया. विक्रेता के कहे अनुसार, घोड़ा उन्हें आसमान में ले गया. दूसरी छलांग में घोड़े को धरती पर आना चाहिए था, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया|


इसके बजाय उसने विक्रम को कुछ दूर चलाया और जंगल में फेंक दिया. विक्रम घायल हो गए और वापसी का रास्ता ढूंढ़ने का प्रयास किया. उन्होंने कहा कि यह सब उनका नसीब है, इसके अलावा और कुछ नहीं हो सकता; वे घोड़े के विक्रेता के रूप में शनि को पहचानने में असफल रहे. जब वे जंगल में रास्ता ढ़ूढ़ने की कोशिश कर रहे थे, डाकुओं के एक समूह ने उन पर हमला किया. उन्होंने उनके सारे गहने लूट लिए और उन्हें खूब पीटा. विक्रम तब भी हालत से विचलित हुए बिना कहने लगे कि डाकुओं ने सिर्फ़ उनका मुकुट ही तो लिया है, उनका सिर तो नहीं. चलते-चलते वे पानी के लिए एक नदी के किनारे पहुंचे. ज़मीन की फिसलन ने उन्हें पानी में पहुंचाया और तेज़ बहाव ने उन्हें काफ़ी दूर घसीटा.


किसी तरह धीरे-धीरे विक्रम एक नगर पहुंचे और भूखे ही एक पेड़ के नीचे बैठ गए. जिस पेड़ के नीचे विक्रम बैठे हुए थे, ठीक उसके सामने एक कंजूस दुकानदार की दुकान थी. जिस दिन से विक्रम उस पेड़ के नीचे बैठे, उस दिन से दुकान में बिक्री बहुत बढ़ गई. लालच में दुकानदार ने सोचा कि दुकान के बाहर इस व्यक्ति के होने से इतने अधिक पैसों की कमाई होती है, और उसने विक्रम को घर पर आमंत्रित करने और भोजन देने का निर्णय लिया. बिक्री में लंबे समय तक वृद्धि की आशा में, उसने अपनी पुत्री को विक्रम के साथ शादी करने के लिए कहा. भोजन के बाद जब विक्रम कमरे में सो रहे थे, तब पुत्री ने कमरे में प्रवेश किया. वह बिस्तर के पास विक्रम के जागने की प्रतीक्षा करने लगी. धीरे- धीरे उसे भी नींद आने लगी. उसने अपने गहने उतार दिए और उन्हें एक बत्तख के चित्र के साथ लगी कील पर लटका दिया. वह सो गई. जागने पर विक्रम ने देखा कि चित्र का बत्तख उसके गहने निगल रहा है. जब वे अपने द्वारा देखे गए दृश्य को याद कर ही रहे थे कि दुकानदार की पुत्री जग गई और देखती है कि उसके गहने गायब हैं. उसने अपने पिता को बुलाया और कहा कि वह चोर है|

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विक्रम को वहां के राजा के पास ले जाया गया. राजा ने निर्णय लिया कि विक्रम के हाथ और पैर काट कर उन्हें रेगिस्तान में छोड़ दिया जाए. जब विक्रम रेगिस्तान में चलने में असमर्थ और ख़ून से लथपथ हो गए, तभी उज्जैन में अपने मायके से ससुराल लौट रही एक महिला ने उन्हें देखा और पहचान लिया. उसने उनकी हालत के बारे में पूछताछ की और बताया कि उज्जैनवासी उनकी घुड़सवारी के बाद गायब हो जाने से काफी चिंतित हैं. वह अपने ससुराल वालों से उन्हें अपने घर में जगह देने का अनुरोध करती है और वे उन्हें अपने घर में रख लेते हैं. उसके परिवार वाले श्रमिक वर्ग के थे; विक्रम उनसे कुछ काम मांगते हैं. वे कहते हैं कि वे खेतों में निगरानी करेंगे और हांक लगाएंगे ताकि बैल अनाज को अलग करते हुए चक्कर लगाएं. वे हमेशा के लिए केवल मेहमान बन कर ही नहीं रहना चाहते हैं|.


एक शाम जब विक्रम काम कर रहे थे, हवा से मोमबत्ती बुझ जाती है. वे दीपक राग गाते हैं और मोमबत्ती जलाते हैं. इससे सारे नगर की मोमबत्तियां जल उठती हैं - नगर की राजकुमारी ने प्रतिज्ञा कि थी कि वे ऐसे व्यक्ति से विवाह करेंगी जो दीपक राग गाकर मोमबत्ती जला सकेगा. वह संगीत के स्रोत के रूप में उस विकलांग आदमी को देख कर चकित हो जाती है, लेकिन फिर भी उसी से शादी करने का फैसला करती है. राजा जब विक्रम को देखते हैं तो याद करके आग-बबूला हो जाते हैं कि पहले उन पर चोरी का आरोप था और अब वह उनकी बेटी से विवाह के प्रयास में है. वे विक्रम का सिर काटने के लिए अपनी तलवार निकाल लेते हैं. उस समय विक्रम अनुभव करते हैं कि उनके साथ यह सब शनि की शक्तियों के कारण हो रहा है. अपनी मौत से पहले वे शनि से प्रार्थना करते हैं. वे अपनी ग़लतियों को स्वीकार करते हैं और सहमति जताते हैं कि उनमें अपनी हैसियत की वजह से काफ़ी घमंड था. शनि प्रकट होते हैं और उन्हें उनके गहने, हाथ, पैर और सब कुछ वापस लौटाते हैं. विक्रम शनि से अनुरोध करते हैं कि जैसी पीड़ा उन्होंने सही है, वैसी पीड़ा सामान्य जन को ना दें. वे कहते हैं कि उन जैसा मजबूत इन्सान भले ही पीड़ा सह ले, पर सामान्य लोग सहन करने में सक्षम नहीं होंगे. शनि उनकी बात से सहमत होते हुए कहते हैं कि वे ऐसा कतई नहीं करेंगे. राजा अपने सम्राट को पहचान कर, उनके समक्ष समर्पण करते हैं और अपनी पुत्री की शादी उनसे कराने के लिए सहमत हो जाते हैं. उसी समय, दुकानदार दौड़ कर महल पहुंचता है और कहता है कि बतख ने अपने मुंह से गहने वापस उगल दिए हैं. वह भी राजा को अपनी बेटी सौंपता है. विक्रम उज्जैन लौट आते हैं और शनि के आशीर्वाद से महान सम्राट के रूप में जीवन व्यतीत करते हैं.

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