line image Kaal Bhairav
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उज्जैन शहर से आठ किलोमीटर दूर भैरवगढ़ क्षेत्र में स्थापित इस मंदिर के बारे में कहा जाता है, इस मंदिर में शिव अपने भैरव स्वरूप में विराजते हैं.| काल भैरव के इस मंदिर में मुख्य रूप से मदिरा का ही प्रसाद चढ़ता है. मंदिर के पुजारी भक्तों के द्वारा चढ़ाए गए प्रसाद को एक तश्तरी में उड़ेल कर भगवान के मुख से लगा देते हैं और देखते -देखते ही भक्तों की आंखों के सामने घटता है वो चमत्कार जिसे देखकर भी यकीन करना एक बार को मुश्किल हो जाता है. क्योंकि मदिरा से भरी हुई तश्तरी पलभर में खाली हो जाती है|


इसके अलावा जब भी किसी भक्त को मुकदमे में विजय हासिल होती है तो बाबा के दरबार में आकर मावे के लड्डू का प्रसाद चढ़ाते हैं तो वहीं जिन भक्तों की सूनी गोद भर जाती है वो यहां बाबा को बेसन के लड्डू और चूरमे का भोग लगाते हैं. प्रसाद चाहे कोई भी क्यों न हो बाबा के दरबार में आने वाले हर भक्त सवाली होता है और बाबा काल भैरव अपने आशीर्वाद से उसके कष्टों को हरने वाले देवता|


बाबा काल भैरव के इस धाम एक और बड़ी दिलचस्प चीज है जो भक्तों का ध्यान बरबस अपनी ओर खींचती है और वो है मंदिर परिसर में मौजूद ये दीपस्तंभ. श्रद्धालुओं द्वारा दीपस्तंभ की इन दीपमालिकाओं को प्रज्जवलित करने से सभी मनोकामनाऐं पूरी होती हैं. भक्तों द्वारा शीघ्र विवाह के लिए भी दीपस्तंभ का पूजन किया जाता है. जिनकी भी मनोकामना पूरी होती है वे दीपस्तंभ के दीप जरूर रोशन करवाते हैं. इसके अलावा मंदिर के अंदर भक्त अपनी मनोकामना के अनुसार दीये जलाते हैं जहां एक तरफ शत्रु बाधा से मुक्ति व अच्छे स्वास्थ्य के लिए सरसों के तेल का दीया जलाने की पंरपरा है तो वहीं अपने मान-प्रतिष्ठा में वृद्धि की इच्छा करने वाले चमेली के तेल का दीया जलाते हैं.|


कालभैरव के इस मंदिर में दिन में दो बार आरती होती है एक सुबह साढ़े आठ बजे आरती की जाती है. दूसरी आरती रात में साढ़े आठ बजे की जाती है. महाकाल की नगरी होने से भगवान काल भैरव को उज्जैन नगर का सेनापति भी कहा जाता है. कालभैरव के शत्रु नाश मनोकामना को लेकर कहा जाता है कि यहां मराठा काल में महादजी सिंधिया ने युद्ध में विजय के लिए भगवान को अपनी पगड़ी अर्पित की थी. पानीपत के युद्ध में मराठों की पराजय के बाद तत्कालीन शासक महादजी सिंधिया ने राज्य की पुर्नस्थापना के लिए भगवान के सामने पगड़ी रख दी थी. उन्होंने भगवान से प्रार्थना की कि युद्ध में विजयी होने के बाद वे मंदिर का जीर्णोद्धार करेंगे. कालभैरव की कृपा से महादजी सिंधिया युद्धों में विजय हासिल करते चले गए. इसके बाद उन्होंने मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया. तब से मराठा सरदारों की पगड़ी भगवान कालभैरव के शीश पर पहनाई जाती है|


बाबा काल भैरव के भक्तों के लिए उज्जैन का भैरो मंदिर किसी धाम से कम नहीं. सदियों पुराने इस मंदिर के बारे में कहा जाता है कि इसके दर्शन के बिना महाकाल की पूजा भी अधूरी मानी जाती है. अघोरी जहां अपने इष्टदेव की आराधना के लिए साल भर कालाष्टमी का इंतजार करते हैं वहीं आम भक्त भी इस दिन उनके आगे शीश नवां कर आशीर्वाद पाना नहीं भूलते| इस मंदिर के बारे में कहा जाता है कि अगर कोई उज्जैन आकर महाकाल के दर्शन करे और कालभैरव न आए तो उसे महाकाल के दर्शन का आधा लाभ ही मिलता है. धार्मिक मान्यता के मुताबिक, कालभैरव को ये वरदान है कि भगवान शिव की पूजा से पहले उनकी पूजा होगी|


इस मंदिर की कहानी बड़ी दिलचस्प है. स्कंद पुराण के मुताबिक चारों वेदों के रचियता ब्रह्मा ने जब पांचवें वेद की रचना करने का फैसला किया तो परेशान देवता उन्हें रोकने के लिए महादेव की शरण में गए. उनका मानना था कि सृष्टि के लिए पांचवे वेद की रचना ठीक नहीं है. लेकिन ब्रह्मा जी ने महादेव की भी बात नहीं मानी. कहते हैं इस बात पर शिव क्रोधित हो गए. गुस्से के कारण उनके तीसरे नेत्र से एक ज्वाला प्रकट हुई. इस ज्योति ने कालभैरव का रौद्ररूप धारण किया, और ब्रह्माजी के पांचवे सिर को धड़ से अलग कर दिया. कालभैरव ने ब्रह्माजी का घमंड तो दूर कर दिया लेकिन उन पर ब्रह्महत्या का दोष लग गया. इस दोष से मुक्ति पाने के लिए भैरव दर दर भटके लेकिन उन्हें मुक्ति नहीं मिली. फिर उन्होंने अपने आराध्य शिव की आराधना की. शिव ने उन्हें शिप्रा नदी में स्नान कर तपस्या करने को कहा. ऐसा करने पर कालभैरव को दोष से मुक्ति मिली और वो सदा के लिए उज्जैन में ही विराजमान हो गए.


कालभैरव भगवान की मूर्ति के सामने झूले में बटुक भैरव की मूर्ति भी विराजमान है । सभागृह के उत्तर दिशा की ओर पाताल भैरवी नाम की एक छोटी सी गुफा भी है । कालभैरव का मंदिर एक ऊँचे टीले पर बना हुआ है जिसके चारो ओर परकोटा बना हुआ है । उज्जैन में काल भैरव को शहर का रक्षक या कोतवाल मन जाता है ।


Description In English (Kaal Bhairav Temple)

Kaal Bhairav Temple said to have been built by king Bhadrasen on the banks of Shipra River. This ancient temple is dedicated to Kaal Bhairav, the chief among the eight Bhairavas. The worship of Kaal Bhairav is a part of Shaivite tradition, mainly by the Kapalika and Aghora sects. The striking feature of the Kaal Bhairav Temple is its exquisite paintings in Malwa style, only traces of which are noticeable. Lord Kaal Bhairav is the manifestation of Lord Shiva who is said to oversee the time ahead. It is also said that the "Time lost is lost forever", so one should make a good use of time in Life. The Kaal Bhairav Temple is the place where Lord Kaal Bhairav is being worshipped. This is a must see for the devotees of the Shaivaites.


Since time cannot be restored the people say that the Kaal Bhairav should be worshipped. Time must be spent keeping in view that spiritual progress is necessary in lives of men. So, people go to the Kaal Bhairav temple in order to worship Kaal Bhairav, Kaal Bhairav is also known as Khetrapala and he is regarded as the guardian of the temple that is why the keys of the Kaal Bhairav temple is to be kept at the temple premise at night and no one should carry it elsewhere. Since Kaal Bhairav is also the protector of the travelers, one should make a garland of Cashew nuts and give it to the God along with lighting a lamp so that he is pleased and save the traveler from any danger. This is to be done especially if the journey is at night. Since dog is the vehicle of the Lord, it is very auspicious to feed dogs which show our respect to Kaal Bhairav. All the offerings to the Kal Bhirava Lord are to be done at the day of Kaal Bhairav Ashthami, when the lord is being worshipped with care and dedication.


The vehicle of Kaal Bhairav is a dog, and the life-like statue of the one outside the sanctum is accompanied by many of its companions of flesh and blood.


KAAL BHAIRAV TEMPLE AARTI

Aarti begins at 7-8a.m.and 6-7 p.m.if we were to offer our own puja (prayer) separately, we’d have to do it after the aarti and we might spend a couple of hours waiting.


 HOW TO REACH KAAL BHAIRAV TEMPLE

we can reach the temple in few minute.The distance between Kaal Bhairav Temple through the railway station and Dewas Gate Bus stand is about 6km.So from station you can hire the taxi or take the city bus which take charges 15Rs/-per head.

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